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रक्षा बंधन की घटना

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मैं एक कहानी बताती हु। साल2013 के रक्षाबंधन के दिन सुबह मैं बहुत खुश थी क्यूंकी मुझे राखी बांधना था भाई लोगो को।तभी मुझे याद आया की मेरे सारे भाई-बहन तो लखनऊ मे है।मैं सोचने लगी की मे किसको राखी बांधू सब तो बाहर है तभी यही सोच के मैं दुखी हो गयी।मैं शनि देव के मंदिर गयी वह फूट-फूट कर रोने लगी और फिर शिकायत कि भगवान से की मेरा कोई भाई आज उपस्थित क्यूँ नहीं है,10-15मिनट के बाद घर से फोन आने के बाद मे अपने घर की और प्रस्थान कर ही रही थी की तभी वहा एक पुजारी आया और मेरा रास्ता रोक ते हुये पूछा, ”क्यू रो रही थी?” मैं जल्दी मे थी इसलिए उसका चेहरा ठीक से नहीं देख पायी और हरबड़ी मे उत्तर दिया, “बस भाई लोगो का इंतज़ार था!”, इसपर मंदिर का पुजारी बोला,”मैं भी यहा मंदिर मे रहेता हु मुझे किसी ने राखी नहीं बांधी,तुम चाहो तो मुझे ही राखी बांध दो”। मैंने सोचो यह नया पंडित है,बांधदेते है दोनों खुश। राखी के बाद मैं बिना कुछ बोले वहा से चली गयी। इससे पहले वो कुछ बोलता यह मे उसको ध्यान से देख पाती,मे बस निकाल गयी क्यूँ कि मुझे थोड़ा सा अजीब लग रहा था,मंदिर खाली था,रास्ते मे भीड़ नहीं थी,और देर हो रही थी। घर आके मेँ रिश्तेदारो के यहा चली गयी। दूसरे दिन मेरा कॉलेज खुल गया था,मैं पढ़ाई मे व्यस्त हो गयी थी,इस घटना को बीते कई दिन हो गए थे।एक दिन अचानक शनिवार को मुझे उसी शनि मंदिर जाना था ।शनिदेव कि मूर्ति देखकर मुझे रक्षाबंधन कि घटना याद आ गयी,मेरे सामने व्ही चित्र आ गया,मेरे मन मे आया कि चलो उस पुजारी से मिला जाए, मे मंदिर के महापुजारी के पास गयी, मैंने उनसे पूछा,”पंडित जी आपके यहा जो नए पंडित आए है उनको जरा बुला दिये” , इसपर उन्होने उत्तर दिया,”बेटा हमारे यहा कोई नया पंडित नयी है,जो भी है सब यहा आरती मे उपास्थिक है।” मैंने फिर उनको याद दिलाया,”पंडित जी याद करे पिछले महीने एक पुजारी था,मध्य काठी,हल्का काले रंग के थे।”, इसपर उन्होने फिर मुझसे कहा ऐसा कोई पंडित नहीं है यहा। मैं एकदम परेशान और सोचने लगी आखिर कौन था वो पंडित? मैंने किसको राखी बांधी? आखिर उसने क्यूँ मुझसे राखी बँधवाई? आखिर उसकी मंशा क्या थी?मै समझ नहीं पा रही थी कि वो पुजारी कौन है? मैं उस बात को आज भी भूल नहीं पायी। अपने काम मे अब व्यस्त हो गयी,लेकिन आज एक साल बीतने के बाद भी यह घटना मेरे दिमाग मे ताज़ी बनी हुयी है,आज भी उस पुजारी कि तलाश है।

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